युवाओं में पनपता असंतोष और बिहार का 'सहयोग मॉडल'

भारत इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। वैश्विक पटल पर आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक मोर्चे पर देश की साख तेजी से बढ़ी है। सरकार ने 'विकसित भारत 2047' का एक महत्वाकांक्षी विजन देश के सामने रखा है। इस पूरे विजन की सबसे बड़ी और मजबूत रीढ़ भारत की विशाल युवा आबादी है।

दुनिया के सबसे युवा देशों में शुमार भारत के पास 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' यानी जनसांख्यिकीय लाभांश की एक ऐसी असीमित ताकत है, जो सही दिशा मिलने पर किसी भी राष्ट्र का कायाकल्प कर सकती है। आर्थिक नीति-निर्माताओं और वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस युवा ऊर्जा को सही अवसर, बेहतर शिक्षा और पारदर्शी व्यवस्था मिले, तो भारत को 2047 से बहुत पहले एक विकसित राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।
 
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू उतना ही चिंताजनक और विचारणीय है। आज जब हम एक तरफ विकसित भारत के सपने बुन रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के विभिन्न हिस्सों से आती खबरें एक अलग ही तस्वीर पेश करती हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक—यूनिवर्सिटी परिसरों, डिग्री कॉलेजों, मेडिकल-इंजीनियरिंग संस्थानों और कोटा या मुखर्जी नगर जैसे बड़े कोचिंग हबों में युवाओं का असंतोष उबल रहा है। छात्र आए दिन सड़कों पर उतरने, प्रदर्शन करने को मजबूर हैं। जिस युवा ऊर्जा का इस्तेमाल शोध, नवाचार, कौशल विकास और राष्ट्र निर्माण में होना चाहिए था, वह अपनी बुनियादी जरूरतों और प्रशासनिक व्यवस्था की बेरुखी से लड़ने में जाया हो रही है। यह स्थिति न केवल हमारी शिक्षा प्रणाली के खोखलेपन को उजागर करती है, बल्कि विकसित भारत की राह में एक बहुत बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर सामने खड़ी होती है।
 
गंभीरता से विश्लेषण करें तो यह बात साफ होती है कि कैंपस में उपज रहा यह बड़ा जनाक्रोश अचानक किसी राजनीतिक उकसावे में पैदा नहीं होता, बल्कि इसके बीज रोजमर्रा की प्रशासनिक उपेक्षा और बदहाली में छिपे होते हैं। देश के अधिकांश सरकारी शैक्षणिक संस्थानों और हॉस्टलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। पीने के लिए दूषित पानी, घटिया गुणवत्ता का खाना, जर्जर भवन, टपकती छतें, शौचालयों की गंदगी, गर्मी के मौसम में लगातार बिजली कटौती, कैंपस में असुरक्षा का माहौल और बिना वजह बढ़ाई जाने वाली फीस—ये ऐसी बुनियादी समस्याएं हैं जिनसे देश का आम छात्र हर रोज जूझता है।
 
समस्या सिर्फ सुविधाओं की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि सबसे बड़ा संकट इन समस्याओं को सुनने वाले तंत्र का न होना है। जब कोई छात्र हॉस्टल की किसी शिकायत को लेकर वार्डन के पास जाता है, तो उसे टाल दिया जाता है। इसके बाद वह प्राचार्य के चक्कर काटता है, और फिर बात नहीं बनने पर उसे जिला शिक्षा अधिकारी या यूनिवर्सिटी के कुलपति कार्यालय की चौखट पर दस्तक देनी पड़ती है। इस पूरी लालफीताशाही और जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया में न तो कोई समयसीमा तय होती है और न ही किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जाती है। हफ्तों और महीनों तक जब फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर घूमती रहती हैं और समस्याओं का समाधान नहीं निकलता, तो छात्रों के भीतर का सब्र टूट जाता है। यही प्रशासनिक बेरुखी अंततः छात्रों को लामबंद होने और उग्र आंदोलन का रास्ता चुनने के लिए मजबूर करती है। जब छात्र सड़कों पर आते हैं, तो पढ़ाई बाधित होती है, कैंपस का माहौल बिगड़ता है और अंततः नुकसान उस पूरी युवा पीढ़ी का होता है।
 
इसी निराशाजनक राष्ट्रीय परिदृश्य के बीच, बिहार सरकार की ओर से एक नया प्रशासनिक प्रयोग सामने आया है, जिसने देश भर के शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। राज्य में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में शुरू की गई 'विद्यार्थी सहयोग' पहल को एक ऐसे क्रांतिकारी कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो युवाओं के असंतोष को आंदोलनों में बदलने से पहले ही उसके समाधान की ठोस जमीन तैयार करता है। इस पहल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसने पारंपरिक और सुस्त सरकारी कार्यशैली को दरकिनार कर एक बेहद पारदर्शी, तकनीक-आधारित और जवाबदेह मॉडल पेश किया है।
 
बिहार के इस 'सहयोग मॉडल' की बनावट को यदि गहराई से समझें, तो इसमें छात्रों की व्यावहारिक सहूलियत का पूरा ध्यान रखा गया है। सरकार द्वारा विकसित किए गए 'विद्यार्थी सहयोग पोर्टल' में शिकायत निवारण की प्रक्रिया को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया गया है। पहली श्रेणी शैक्षणिक संस्थानों—यानी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के लिए बनाई गई है, जबकि दूसरी श्रेणी विशेष रूप से हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए तय की गई है। इस वर्गीकरण का सबसे बड़ा फायदा यह है कि छात्र को अपनी समस्या दर्ज कराने के लिए अलग-अलग जगह भटकना नहीं पड़ता और वह सीधे संबंधित विभाग के पास अपनी बात पहुंचा सकता है।
 
पोर्टल के इंटरफेस को बेहद सरल और उपयोगकर्ता-अनुकूल रखा गया है। शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी भी छात्र को जटिल कागजी कार्रवाई या लंबी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। छात्र को केवल अपना नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्मतिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है। डिजिटल डिवाइड को ध्यान में रखते हुए ईमेल आईडी की बाध्यता को पूरी तरह वैकल्पिक रखा गया है, ताकि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे छात्र भी शिकायत दर्ज करा सकें जिनके पास ईमेल की सुविधा नहीं है। फर्जी शिकायतों को रोकने और फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने के लिए मोबाइल नंबर का सत्यापन ओटीपी के माध्यम से अनिवार्य किया गया है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि हर शिकायत एक असली और पीड़ित छात्र की ओर से ही दर्ज की गई है।
 
इस पोर्टल की कार्यप्रणाली में समस्याओं को पहले से ही अलग-अलग विषयों में बांट दिया गया है। जैसे—पेजजल, मेस का भोजन, शौचालय की सफाई, सुरक्षा व्यवस्था, बिजली आपूर्ति, इंटरनेट और बुनियादी ढांचा। छात्र को केवल अपनी समस्या की श्रेणी चुननी होती है और संबंधित फॉर्म भरकर सबमिट कर देना होता है। इसके अलावा, पोर्टल केवल शिकायत दर्ज करने का माध्यम नहीं है; यह छात्रों को व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अपने रचनात्मक सुझाव साझा करने का मंच भी देता है। सबसे अहम बात यह है कि शिकायत दर्ज होते ही छात्र को एक विशिष्ट ट्रैकिंग आईडी मिल जाती है, जिसके जरिए वह अपने मोबाइल से ही यह देख सकता है कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास लंबित है और उस पर क्या कार्रवाई हुई है।
प्रशासनिक सूत्रों और इस व्यवस्था से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि बिहार मॉडल की असली ताकत इसका 'कड़ा जवाबदेही तंत्र' और '30 दिनों की सख्त समयसीमा' है। पोर्टल पर आने वाली हर शिकायत का निस्तारण अधिकतम 30 दिनों के भीतर करना प्रशासनिक रूप से अनिवार्य बना दिया गया है। जब शिकायत का समाधान हो जाता है, तो इसकी लिखित सूचना संबंधित छात्र को भेजी जाती है, ताकि यह पूरी तरह पारदर्शी रहे कि वास्तव में कार्रवाई हुई है या नहीं। इसके साथ ही छात्रों के मन से इस डर को पूरी तरह निकाल दिया गया है कि शिकायत करने पर संस्थान का प्रशासन या हॉस्टल वार्डन उनके खिलाफ कोई सुधारात्मक या दंडात्मक कार्रवाई करेगा। इसके लिए जिला प्रशासन ने शिकायतकर्ता की पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखने का सख्त प्रावधान लागू किया है।
 
डिजिटल भारत के इस दौर में भी कई ऐसे छात्र हैं जो इंटरनेट का इस्तेमाल करने में सहज नहीं हैं या जिनके पास स्मार्टफोन की सुविधा नहीं है। बिहार सरकार ने ऐसे छात्रों को भी इस व्यवस्था से बाहर नहीं रखा है। उनके लिए '1100' टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है, जहां कॉल करके कोई भी छात्र अपनी समस्या दर्ज करवा सकता है।
 
डिजिटल माध्यमों के अलावा, इस मॉडल का सबसे व्यावहारिक पहलू इसका जमीनी क्रियान्वयन है। केवल ऑनलाइन पोर्टल बनाकर बैठ जाने के बजाय सरकार ने हर महीने जिला और ब्लॉक स्तर पर 'सहयोग शिविर' आयोजित करने की अनिवार्य व्यवस्था बनाई है। इन शिविरों में क्षेत्र के विधायक, सांसद, प्रशासनिक अधिकारी और शिक्षा विभाग के आला अफसर सीधे स्कूल और कॉलेजों में जाते हैं। वे वहां छात्रों से आमने-सामने बैठकर संवाद करते हैं और उनकी समस्याओं को सुनते हैं। इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों को भी मौके पर ही इसी पोर्टल पर दर्ज किया जाता है और उसी 30 दिन की समयसीमा के तहत ट्रैक किया जाता है। यह व्यवस्था उन ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के छात्रों के लिए वरदान साबित हो रही है, जो ऑनलाइन शिकायतों की तुलना में सीधे बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं।
 
इस पूरे मॉडल का सबसे कठोर और प्रभावी हिस्सा वह प्रावधान है जो लापरवाह अधिकारियों पर नकेल कसता है। अगर कोई अधिकारी तय समयसीमा यानी 30 दिनों के भीतर किसी छात्र की शिकायत का संतोषजनक समाधान नहीं करता या प्रक्रिया में अकारण देरी करता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का सीधा नियम बनाया गया है। इसी एक प्रावधान ने इस पहल को महज कागजी घोषणा बनने से रोक दिया है और प्रशासनिक मशीनरी को छात्रों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील और तत्पर बना दिया है।
 
आज जब हम देश के विभिन्न राज्यों में उबलते छात्र आंदोलनों, यूनिवर्सिटी परिसरों में तनाव और युवाओं में व्यवस्था के प्रति गहरी होती निराशा को देखते हैं, तो बिहार का यह 'सहयोग मॉडल' एक पथ-प्रदर्शक की भूमिका में नजर आता है। यह मॉडल देश के बाकी राज्यों को यह स्पष्ट संदेश देता है कि युवाओं के आक्रोश को दबाने, उन पर पुलिस बल प्रयोग करने या उनकी आवाज़ को अनसुना करने से समस्याएं हल नहीं होतीं। असली समाधान तब निकलता है जब शासन में पारदर्शिता हो, प्रक्रियाओं में सादगी हो, शिकायतों के निपटारे की निश्चित समयसीमा हो और अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय हो।
 
शिक्षा व्यवस्था में बड़े-बड़े बजट आवंटित करना और नई-नई नीतिगत घोषणाएं करना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर छात्र की रोजमर्रा की समस्याओं को नहीं सुलझाया जाएगा, तब तक एक आदर्श शैक्षणिक माहौल की कल्पना नहीं की जा सकती। युवाओं के दम पर 'विकसित भारत 2047' के सपने को साकार करना है, तो देश के हर राज्य को अपने यहां के युवाओं में यह विश्वास जगाना होगा कि सरकार उनकी बात सुन रही है और उनकी समस्याओं के प्रति गंभीर है। बिहार के इस 'विद्यार्थी सहयोग मॉडल' ने उस दिशा में एक मजबूत और अनुकरणीय राह दिखाई है। अब यह देश के अन्य राज्यों पर निर्भर करता है कि वे इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां की युवा शक्ति को संबल देने के लिए इसे किस रूप में लागू करते हैं।

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