घर ही नहीं, देश भी संभाल रही महिलाएं
बेशक नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू कराने की केंद्र सरकार की पहल संसद में विफल रही हो, पर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महिलाएं आज हाशिए पर नहीं, बल्कि सरकार से लेकर समाज तक अपने दमखम से आगे बढ़ रही हैं।
बेशक नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू कराने की केंद्र सरकार की पहल संसद में विफल रही हो, पर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महिलाएं आज हाशिए पर नहीं, बल्कि सरकार से लेकर समाज तक अपने दमखम से आगे बढ़ रही हैं। खासतौर पर केंद्र में नरेंद्र मोदी के एक दशक से लंबे शासनकाल की सबसे चमकदार बात यह है कि इस दौरान नीति से लेकर योजनाओं तक महिलाओं को तारीखी तौर पर सबसे ज्यादा अहमियत मिली है। खुद पीएम मोदी के ही शब्दों में कहें तो भारत आज ‘वीमेन डेवलपमेंट’ से आगे बढ़कर ‘वीमेन लेड डेवलपमेंट’ के दौर में पहुंच चुका है।
ऐतिहासिक तौर पर देखें तो भारत में दशकों तक सियासी दलों के लिए महिलाएं महज 'मौन मतदाता' (साइलेंट वोटर) रहीं हैं। उन्हें चुनावी घोषणापत्रों में महज कुछ औपचारिक वादों और लोक-लुभावन नारों तक सीमित रखा जाता रहा। जाहिर है कि पितृसत्तात्मक समाज की छाया से राजनीति भी मुक्त नहीं रही। पर 2014 के बाद भारत ने एक व्यापक वैचारिक, रणनीतिक और ढांचागत बदलाव देखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीति की प्राथमिकता तय करने वाले चश्मे को ही बदल दिया। उन्होंने भारतीय नारी को केवल 'याचक' या 'लाभार्थी' के रूप में नहीं, बल्कि 'विकास की सारथी' और 'राष्ट्र निर्माता' के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह दशक इस बात की जीवंत गवाही है कि कैसे केंद्र सरकार की योजनाओं ने महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक बेड़ियों को काटकर उन्हें अपने अधिकारों और अपनी राजनीतिक ताकत के प्रति जागरूक किया है।
स्वच्छ भारत मिशन से लेकर उज्ज्वला योजना तक, केंद्र सरकार जहां एक तरफ महिलाओं की सामाजिक स्थिति में एक बड़ा उभार लाई, वहीं जन-धन योजना से लेकर लखपति दीदी जैसी योजनाओं ने महिलाओं के उद्यम और आर्थिक सामर्थ्य को बढ़ाया। खासतौर पर बैंकिंग सिस्टम से जुड़ना महिलाओं के लिए क्रांतिकारी रहा। बात करें अकेले प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की तो इसमें सबसे अधिक लाभार्थी महिलाएं हैं। अप्रैल 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल मुद्रा ऋणों में से लगभग 68 से 70 फीसदी हिस्सा महिला उद्यमियों को दिया गया है। इसी तरह पेंशन और सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में आने से बिचौलियों का अंत हुआ और महिलाओं की वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी।
इन तमाम पहलों का व्यापक मनोवैज्ञानिक असर यह हुआ कि महिलाओं के भीतर यह अटूट विश्वास जागा कि दिल्ली की गद्दी पर बैठा व्यक्ति उनकी रसोई से लेकर उनकी गरिमा तक की चिंता करता है। निश्चित रूप से इस विश्वास ने महिलाओं को एक स्वतंत्र और जागरूक मतदाता वर्ग में तब्दील किया। बड़ी बात यह है कि देश में सत्ता की राजनीति को तय करने वाला यह लैंगिक कंपास आज भारतीय लोकतंत्र के संघवादी चरित्र को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।
हाल में संपन्न महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश और बिहार के विधानसभा चुनावों को देखें तो लाडली बहना से लेकर जीविका मिशन से जुड़ी योजनाओं ने महिलाओं के बीच एक अभूतपूर्व लहर पैदा की। इन राज्यों में भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की प्रचंड जीत के पीछे इन महिलाओं का वह मूक समर्थन था, जो मतदान केंद्रों पर लंबी कतारों के रूप में दिखा। इसी तरह उत्तर प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी महिलाओं ने सुरक्षा और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मुखर होकर बदलाव की पटकथा लिखी। बात करें बीते दिनों संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तो, इसके नतीजे ने महिलाओं के बीच आई जागरूकता को क्रांतिकारी तरीके से रेखांकित किया। पश्चिम बंगाल ने दिखाया कि राजनीतिक जड़ता के साथ वे खड़ी होने को तैयार नहीं। साफ है कि विभिन्न मदों में योजनात्मक लाभ से आगे बढ़कर महिलाएं आज देश और समाज के व्यापक उत्थान के विजन वाली राजनीति और सरकारों को पसंद कर रही हैं।
यह असर कितना बड़ा और व्यापक है कि गोवा जैसे राज्य में भी वही सरकारें चुनकर आ रही हैं, जो महिलाओं की भूमिका और क्षमता को समझती हैं। तारीफ करनी होगी वहां के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत की कि उन्होंने प्रदेश में महिला उद्यमियों के लिए एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है, जहां वे पर्यटन, स्थानीय हस्तशिल्प और ब्लू इकोनॉमी में नेतृत्व कर रही हैं। गोवा का मॉडल दिखाता है कि जब महिलाओं की भागीदारी जीडीपी में बढ़ती है, तो राज्य की आर्थिक प्रगति की गति दोगुनी हो जाती है।
इस संदर्भ में बिहार की चर्चा अलग से जरूरी है। 2006 में बिहार में पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। तब ऐसा करने वाला बिहार देश का पहला राज्य था। 2006 में ही बिहार सरकार ने प्रारंभिक शिक्षक नियुक्ति में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इसी तरह वर्ष 2007 से नगर निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला। 2006 में ही बिहार सरकार ने प्रारंभिक शिक्षक नियुक्ति में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय किया। इसी तरह, 2007 से नगर निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला। आगे चलकर 2013 में बिहार पुलिस में महिलाओं को 35 फीसदी आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इन निर्णयों इस सूबे का एक नया चरित्र उभरा। यह चरित्र है सामाजिक बदलाव की सीध पर आगे बढ़ते हुए विकास की चुनौतियों पर खरा उतरने का। कभी जंगलराज की लानत से नवाजा जाने वाला राज्य आज देश और देश से बाहर के परिवर्तन, विकास और राजनीति के एक संतुलित मॉडल के तौर पर देखा और सराहा जाता है। बीते वर्ष संपन्न विधानसभा चुनाव में बिहार ने एक बार फिर दिखाया कि वह उस सरकार सरोकार के साथ है, जो लैंगिक दुराग्रह से मुक्त होकर प्रदेश को विकास और समृद्धि की राह पर ले जाने का न सिर्फ विजन रखता हो, बल्कि उस पर अमल भी करता हो। ये उस बिहार की सच्चाई है जहां शराबबंदी जैसे फैसले के साथ तो मजबूती के साथ खड़ी हैं ही, वह विकसित बिहार के संकल्प के साथ भी एकजुट हैं।
खासौतर पर बिहार विधानसभा चुनाव से ऐन पहले महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के शुरू की गईं मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की ताकत को जिन लोगों ने राजनीतिक तौर पर देखा-परखा, उन्हें इससे अब तक लाभान्वित हुई 1.81 करोड़ महिलाओं के जोश और जज्बे को भी देखना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में अपने कौशल का परचम लहरा रही ये महिलाएं आज बिहार में विकास और बदलाव के नए टैंपलेंट में रंग भर रही हैं।