उच्च शिक्षा के वैश्विक मानचित्र पर उभरता भारत

पिछले कई दशकों से देश के मध्य और उच्च-मध्य वर्गीय परिवारों के बीच यह स्थापित चलन रहा है कि यदि बच्चों को वैश्विक स्तर की शिक्षा दिलानी है,

तो उन्हें लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके सात समंदर पार भेजना होगा। लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के दूरदर्शी विजन और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की सक्रियता ने इस स्थापित ढर्रे को पूरी तरह से बदल दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर के लगभग 19 विदेशी विश्वविद्यालयों ने भारत में अपने स्वतंत्र परिसर स्थापित करने में रुचि दिखाई है, जिनमें से 17 प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के संचालन और आगामी योजनाओं की पूरी रूपरेखा भी सामने आ चुकी है। शिक्षा जगत में आए इस बदलाव को 'बिना प्रवासन के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा' के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत की युवा आबादी के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा है।

इस बड़े बदलाव की बुनियादी वजहों को समझने के लिए हमें उस वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालनी होगी, जिसने भारतीय छात्रों को विदेश जाने के अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। वर्ष 2023 तक जहां लगभग 892,989 भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे थे, वहीं वर्ष 2024 की शुरुआत से ही विदेशी शिक्षा के इस पारंपरिक रुझान में करीब 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे पारंपरिक रूप से पसंदीदा रहे देशों की आव्रजन और छात्र वीजा नीतियों में आई कड़ाई है। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने वीजा प्रक्रियाओं को जटिल करने के साथ-साथ एच-1बी पेटिशन फीस को करीब 100,000 डॉलर तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है, जबकि कनाडा ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के प्रवेश में सीधे 50 प्रतिशत की कटौती कर दी है।

वहीं, ऑस्ट्रेलिया ने अपनी पुरानी प्रवेश परीक्षा (जीटीई) को हटाकर अधिक कड़े 'जेन्युइन स्टूडेंट' (जीएस) को लागू कर दिया है। इतना ही नहीं ऑस्ट्रेलिया ने जुलाई 2025 से छात्र वीजा शुल्क को 710 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से बढ़ाकर सीधे 2,000 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर कर दिया है। इस कारण ऑस्ट्रेलिया सर्वाधिक महंगा वीजा वाले देशों में शुमार हो गया है।

बात ब्रिटेन की करें तो इसने भी वर्क राइट्स को 24 महीने से घटाकर 18 महीने कर दिया है। ब्रिटेन ने कुशल प्रवासियों के लिए न्यूनतम वेतन की सीमा बढ़ा दी है। यहां एडुफंड–व्हाइट ब्रिज एजुकेशन के व्हाइट पेपर का जिक्र लाजमी है। इस व्हाइट पेपर के अनुसार इन कड़े नियमों और ट्यूशन फीस बढ़ोत्तरी के कारण अब भारतीय परिवारों के लिए विदेशों में शिक्षा बहुत ही महंगी होती जा रही है। हालांकि, इन सबके बीच यह खबर किसी राहत की तरह है कि अब विदेशी शैक्षणिक संस्थान भारत में अपने कैंपस खोलने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

अगर भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों की संख्या देखें तो 2021-22 में यह संख्या 4.33 करोड़  थी जिसमें 2024-25 में 13.8 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई। इससे स्पष्ट है कि भारत में उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले शैक्षणिक संस्थानों की मांग कितनी अधिक है। जबकि हकीकत यह है कि देश में केवल 1,213 विश्वविद्यालय और तकरीबन 58,643 उच्च शिक्षा संस्थान ही उपलब्ध हैं, जिनसे मांग और आपूर्ति के बीच बहुत बड़ी खाई पैदा हो गई है। जिसे पाटने के लिए एनईपी 2020 ने कौशल-आधारित, बहुविषयक शिक्षा और शिक्षा के वैश्वीकरण पर जोर दिया। यहां उन विदेशी शैक्षणिक संस्थानों का जिक्र अतिआवश्यक है जिन्होंने भारत में कैंपस खोलने में दिलचस्पी दिखाई है। यूके का कोवेंट्री यूनिवर्सिटी ग्रुप साल 2026 के अंत तक गुजरात की गिफ्ट सिटी में अपना कैंपस शुरू करेगा। इस संस्थान से छात्र बिजनेस में बीएससी ऑनर्स की डिग्री ले सकेंगे। यूनाइटेड किंगडम के प्रतिष्ठित और पुराने संस्थान बर्कबेक, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन ने आधिकारिक तौर पर बेंगलुरु में अपने स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय परिसर (आईबीसी) का संचालन शुरू कर दिया है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया का डिकिन विश्वविद्यालय गिफ्ट सिटी में बिजनेस एनालिटिक्स समेत साइबर सिक्योरिटी में पोस्टग्रेजुएट पाठ्यक्रम संचालित कर रहा है। अमेरिका का मशहूर इलिनायस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सितंबर 2026 से मुंबई में कंप्यूटर साइंस, इंजीनियरिंग और बिजनेस में अपना प्रैक्टिकल 'एलीवेट' प्रोग्राम शुरू करेगा। इटली का प्रसिद्ध इस्टीट्यूटो यूरोपियो डी डिजाइन (आईईडी) वर्ष 2026-27 के दौरान मुंबई में फैशन व डिजाइन की पढ़ाई शुरू करेगा।

इसी कड़ी में, ब्रिटेन का लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी दिसंबर 2026 से बेंगलुरु में बिजनेस और कंप्यूटिंग की डिग्रियां देना शुरू करेगा। वहीं, क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट गिफ्ट सिटी में फाइनेंस, बिजनेस एनालिटिक्स और पब्लिक पॉलिसी में पांच विशिष्ट एमएससी पाठ्यक्रम संचालित कर रहा है। स्कॉटलैंड का यूनिवर्सिटी ऑफ एबरडीन सितंबर 2026 से मुंबई में डेटा साइंस, एआई और एमबीए के पाठ्यक्रम शुरू करने के साथ एक शोध कार्यालय भी स्थापित करेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल मुंबई में एआई और डेटा साइंस अनुसंधान के लिए 'एंटरप्राइज कैंपस' बना रहा है। साथ ही, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (यूएनएसडब्ल्यू) भी अगस्त 2026 से बेंगलुरु में कंप्यूटर साइंस और साइबर सिक्योरिटी के डिग्री प्रोग्राम शुरू करेगा।

इसके अलावा, यूके का यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन गुरुग्राम में अपने कैंपस शुरू कर चुका है। कैंपस में छात्र कंप्यूटर साइंस, इकोनॉमिक्स और इंटरनेशनल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे हैं। यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ सर्रे वर्ष 2026-27 से गिफ्ट सिटी में इंजीनियरिंग और डेटा साइंस की पढ़ाई शुरू करेगी। यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क सितंबर 2026 से मुंबई में एआई और साइबर सिक्योरिटी की पढ़ाई कराएगी तो वहीं वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी सितंबर 2026 से ग्रेटर नोएडा में कंप्यूटर साइंस के साथ-साथ स्मार्ट फार्मिंग के लिए एक एक्सीलेंस सेंटर खोलेगी।

विदेशी संस्थाएं वर्तमान समय को ध्यान में रखकर कोर्सेज पर तो ध्यान दे ही रहीं है ये छात्रों को दोहरी पढ़ाई का लाभ भी दे रही है। यानी अधिकतर संस्थानों में छात्र चाहें तो भारत में दो साल पढ़ाई के साथ बाकि बचे साल विदेश में जाकर पढ़ सकते हैं। वैसे इस चमकदार भविष्य के साथ कई गंभीर चुनौतियां भी बरकरार हैं, जिन पर सरकार को गंभीरता से ध्यान देना होगा। पहली, इन संस्थानों की महंगी फीस है। इन संस्थानों की फीस कई घरेलू कॉलेजों से बहुत अधिक है, इसलिए यह डर हमेशा रहेगा कि ये कहीं केवल संपन्न वर्ग के छात्रों तक न सीमित रह जाएं। साथ ही, घरेलू संस्थानों से बेहतरीन प्राध्यापकों का इन परिसरों में चले जाना आंतरिक प्रतिभा पलायन को जन्म दे सकता है। यदि सरकार और यूजीसी गुणवत्ता, वहनीयता और समावेशिता के बीच संतुलन बनाए रखने में सफल रहते हैं, तो यह पहल भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था के अग्रणी केंद्रों में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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